Wednesday, 4 July 2012

दीया अंतिम आस का [एक सिपाही की शहादत के अंतिम क्षण ]


दीया अंतिम आस का [एक सिपाही की शहादत के अंतिम क्षण ]


दीया अंतिम आस का, प्याला अंतिम प्यास का
वक्त नहीं अब, हास परिहास उपहास का
कदम बढाकर मंजिल छू लूँ, हाथ उठाकर आसमाँ
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का

बस एक बार उठ जाऊँ, उठकर संभल जाऊँ
दोनों हाथ उठाकर, फिर एक बार तिरंगा लहराऊँ
दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का
कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का


बस एक बूँद लहू की भरदे मेरी शिराओं में
लहरा दूँ तिरंगा मैं इन हवाओं में........
फहरा दूँ विजय पताका चारों दिशाओ में
महकती रहे मिट्टी वतन की, गूंजती रहे गूंज जीत की
सदियों तक सारी फिजाओं में………..

सपना अंतिम आँखों में, ज़स्बा अंतिम साँसों में
शब्द अंतिम होठों पर, कर्ज अंतिम रगों पर
बूँद आखरी पानी की, इंतज़ार बरसात का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का…

अँधेरा गहरा, शोर मंद,
साँसें चंद, हौंसला बुलंद,
रगों में तूफान, ज़ज्बों में उफान,
आँखों में ऊँचाई, सपनों में उड़ान
दो कदम पर मंजिल, हर मोड़ पर कातिल
दो साँसें उधार दे, कर लूँ मैं सब कुछ हासिल

ज़ज्बा अंतिम सरफरोशी का, लम्हा अंतिम गर्मजोशी का
सपना अंतिम आँखों में, ज़र्रा अंतिम साँसों में
तपिश आखरी अगन की, इंतज़ार बरसात का

फिर एक बार जनम लेकर इस धरा पर आऊँ
सरफरोशी में फिर एक बार फ़ना हो जाऊँ
गिरने लगूँ तो थाम लेना, टूटने लगूँ तो बाँध लेना
मिट्टी वतन की भाल पर लगाऊँ
मैं एक बार फिर तिरंगा लहराऊँ

दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का
कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का
पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का......

दिनेश गुप्ता 'दिन' [ HTTPS://WWW.FACEBOOK.COM/DINESHGUPTADIN ]

Tuesday, 3 July 2012

कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं………..


शब्द नए चुनकर गीत वही हर बार लिखूँ मैं
उन दो आँखों में अपना सारा संसार लिखूँ मैं
विरह की वेदना लिखूँ या मिलन की झंकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं……………

उसकी देह का श्रृंगार लिखूँ या अपनी हथेली का अंगार लिखूँ मैं
साँसों का थमना लिखूँ या धड़कन की रफ़्तार लिखूँ मैं
जिस्मों का मिलना लिखूँ या रूहों की पुकार लिखूँ मैं
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ मैं…………….

उसके अधरों का चुंबन लिखूँ या अपने होठों का कंपन लिखूँ मैं
जुदाई का आलम लिखूँ या मदहोशी में तन मन लिखूँ मैं
बेताबी,  बेचैनी,  बेकरारी,  बेखुदी, बेहोशी,  ख़ामोशी……......
कैसे चंद लफ़्ज़ों में इस दिल की सारी तड़पन लिखूँ मैं

इज़हार लिखूँ, इकरार लिखूँ, एतबार लिखूँ, इनकार लिखूँ मैं
कुछ नए अर्थों में पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं........
इस दिल का उस दिल पर, उस दिल का किस दिल पर
कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा अधिकार लिखूँ मैं....................

होठों की ख़ामोशी लिखूँ या अंतर की आवाज़ लिखूँ मैं…
अंजाम लिखूँ इश्क का या मुहब्बत का आगाज़ लिखूँ मैं
गीत लिखूँ मिलन के या जुदाई के अल्फाज़ लिखूँ मैं...
बिखरे हुए सुरों से कैसे कोई नया साज़ लिखूँ मैं........

कजरे की धार लिखूँ या फूलों वाला हार लिखूँ मैं
लबों की शोखी लिखूँ या आँखों का इकरार लिखूँ मैं
इस रीते तन-मन से, अधूरे, अकेले खाली पन से
कैसे नवयौवन-मधुबन का सारा श्रृंगार लिखूँ मैं  

                                                       कैसे चंद लफ़्ज़ों में सारा प्यार लिखूँ  मैं………..

दिनेश गुप्ता ‘दिन’ [https://www.facebook.com/dineshguptadin]